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June 6, 2026

हिंदू आतंकवाद’ शब्द को जन्म देने वाले मालेगांव ब्लास्ट की पूरी कहानी, 17 साल बाद सभी आरोपी बरी…

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मालेगांव ब्लास्ट मामले में मुंबई की स्पेशल कोर्ट ने साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर सहित सभी सात आरोपियों को बरी कर दिया है. कोर्ट ने कहा कि जो आरोप इनपर लगाए गए हैं, उसे साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं. मालेगांव ब्लास्ट भारत के सबसे चर्चित आतंकवादी घटनाओं में से एक है. यह घटना आज से 17 साल पहले महाराष्ट्र के नासिक जिले के मालेगांव में हुई थी. इस विस्फोट में एक फ्रीडम बाइक का इस्तेमाल किया गया था, विस्फोट के बाद 6 लोगों की मौत हो गई थी और सौ से अधिक लोग घायल हुए थे. मालेगांव विस्फोट मामले में जो नाम सबसे चर्चित है वह साध्वी प्रज्ञा ठाकुर का है, जो बीजेपी की भोपाल से सांसद रह चुकी हैं. इस विस्फोट के बाद एक नया शब्द प्रचलन में आया था ‘हिंदू आतंकवाद’.

नासिक जिले के मालेगांव में यह विस्फोट हुआ था. तारीख थी 29 सितंबर 2008, उस वक्त रात के नौ बज रहे थे, चूंकि रमजान का महीना था और इफ्तार की वजह से सड़क पर भीड़ बहुत ज्यादा थी. मालेगांव के भिकू चौक इलाके में यह विस्फोट हुआ था, जहां अधिकतर आबादी मुस्लिम है. विस्फोट के लिए एक फ्रीडम बाइक का इस्तेमाल किया गया था जो भीड़भाड़ वाले इलाके में खड़ी थी. विस्फोट से बाइक फट गया और आसपास मौजूद लोग इसकी चपेट में आ गए. विस्फोट में जो लोग मारे गए और घायल हुए वे सभी स्थानीय लोग थे, जिनमें दुकानदार और राहगीर शामिल थे. चूंकि यह विस्फोट रमजान के महीने में मुस्लिम इलाके में हुआ था, इसलिए जांच एजेंसियों ने इसे सांप्रदायिकता से प्रेरित आतंकी हमला बताया था.

एटीएस ने शुरू की थी जांच

विस्फोट के बाद इसकी गंभीरता को देखते हुए मामले की जांच एटीएस(Anti-Terrorism Squad) को सौंप दी गई थी. एटीएस के प्रमुख उस वक्त हेमंत करकरे थे. एटीएस ने जांच के दौरान कई लोगों को गिरफ्तार किया जिनमें साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर का नाम सबसे ऊपर है. मालेगांव विस्फोट मामले में साध्वी प्रज्ञा की गिरफ्तार इसलिए हुई थी क्योंकि जिस बाइक में विस्फोटक रखा गया था उसका रजिस्ट्रेशन उनके नाम पर था. बाद में भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत पुरोहित की भी गिरफ्तारी हुई, उनपर विस्फोटक का इंतजाम करने का आरोप लगा. जनवरी 2009 में एटीएस ने अपनी पहली चार्जशीट दायर की, जिसमें 11 आरोपियों और तीन वांछित व्यक्तियों के नाम थे, जिसमें साध्वी प्रज्ञा और लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित को मुख्य साजिशकर्ता बताया गया था उनपर विस्फोटक का इंतजाम करने का आरोप लगा. जनवरी 2009 में एटीएस ने अपनी पहली चार्जशीट दायर की, जिसमें 11 आरोपियों और तीन वांछित व्यक्तियों के नाम थे, जिसमें साध्वी प्रज्ञा और लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित को मुख्य साजिशकर्ता बताया गया था. इस केस में UAPA, IPC और महाराष्ट्र कंट्रोल ऑफ ऑर्गेनाइज्ड क्राइम एक्ट (MCOCA) के तहत केस दर्ज किया गया. हालांकि बाद में 31 जुलाई 2009 को, एक विशेष अदालत ने सबूतों की कमी का हवाला देते हुए MCOCA के आरोप हटा दिए थे. एटीएस का दावा था कि यह विस्फोट हिंदू आतंकवाद का परिणाम है, जिसमें मुसलमानों को टारगेट किया गया है. 19 जुलाई 2010 को बंबई हाई कोर्ट ने MCOCA के आरोपों को फिर से बहाल कर दिया और उसके बाद 13 अप्रैल 2011 को मालेगांव विस्फोट केस राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) को स्थानांतरित कर दिया गया. एनआईए ने जब जांच की शुरुआत की तो उसने पाया कि कुछ सबूत तो सही हैं, लेकिन कुछ आरोप सही नहीं हैं.आरोपियों को अभिनव भारत नाम के संगठन से जुड़ा बताया गया था. एनआईए ने अपनी जांच में मकोका के आरोपों को हटा दिया और यह कहा कि एटीएस ने अपनी जांच में कुछ आरोपों को गढ़ा है दबाव बनाकर कबूलनामा करवाया है. इसके बाद जांच जारी रही.

एनआईए ने साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को दिया क्लीनचिट

एनआईए ने 2016 में साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को क्लीनचिट दे दिया और कोर्ट से यह सिफारिश की उनपर से चार्ज हटा दिया जाए, लेकिन कोर्ट ने चार्ज हटाने से इनकार किया और मामले की सुनवाई जारी रही. उसके बाद कोर्ट ने कोर्ट ने UAPA (Unlawful Activities Prevention Act) को भी हटा दिया. 2017 में स्वास्थ्य कारणों से प्रज्ञा सिंह ठाकुर को जमानत मिल गई और बाकी आरोपियों को भी धीरे-धीरे जमानत पर छोड़ दिया गया, लेकिन जांच जारी रही. इसी बीच 2019 के लोकसभा चुनाव में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को बीजेपी ने टिकट दिया और उन्होंने भोपाल से चुनाव लड़ा और दिग्विजय सिंह को परास्त किया

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