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ना क्वारंटाइन, ना ही लॉकडाउन; कोरोना वायरस के साथ जीने को तैयार है यह देश

 नई दिल्ली।

एक तरफ जहां पूरी दुनिया कोरोना से बचाव के लिए क्वारंटाइन नियमों के पालन पर जोर दे रही है, वहीं दक्षिण अफ्रीका कोरोना से जंग में बदलाव की नई राह पर चल रहा है। बीते दिसंबर के अंतिम दिनों से दक्षिण अफ्रीकी सरकार ने कोरोना संक्रमितों के संपर्क में आए व्यक्तियों का पता लगाने और उन्हें क्वारंटाइन करने पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी। साथ ही सरकार लॉकडाउन के भी पक्ष में नहीं है।

दक्षिण अफ़्रीकी सरकार ने कोरोना महामारी पर नज़र रखते हुए अधिक व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाने का फैसला किया है। क्वारंटाइन नियम अपनाने के बजाय सरकार का ज्यादा जोर स्वास्थ्य प्रणाली सुधारने पर है। सरकार का मानना है कि अर्थव्यवस्था, आजीविका और समाज के अन्य पहलुओं पर प्रतिबंधों का अप्रत्यक्ष रूप से सही, लेकिन हानिकारक प्रभाव पड़ता है। बजाय किसी प्रतिबंध के वायरस के साथ जीने के तरीकों की तलाश करना ज्यादा जरूरी है। यह दक्षिण अफ्रीका जैसे संसाधनविहीन देशों के लिए खास तौर पर प्रासंगिक है। इसलिए सरकार विश्व स्तर पर चल रही उन नीतियों (कोरोना के केस में) का आंख बंद करके पालन नहीं करेगी, जो स्थानीय स्तर पर संभव नहीं हैं और जिससे नाममात्र का लाभ प्राप्त होता है।

जनसंख्या प्रतिरक्षा: नए दृष्टिकोण का मुख्य तत्व उच्च स्तर की जनसंख्या प्रतिरक्षा से है। दक्षिण अफ्रीका के आर्थिक केंद्र गौतेंग में ओमीक्रोन लहर की शुरुआत से ठीक पहले किए गए एक सीरो-सर्वेक्षण ने संकेत दिया कि पहली तीन लहरों के दौरान 72% लोग संक्रमित हुए थे। कोविड​​​​-19 में सीरो-पॉजिटिविटी 79% और 93% थी। सीरो-सर्वेक्षण के आंकड़ों से पता चलता है कि देश में कोरोना के खिलाफ प्रतिरक्षा पहली तीन लहर के दौरान और टीकाकरण के आगमन से पहले प्राकृतिक संक्रमण के माध्यम से विकसित हुई।

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